कभी खुद को देखा है….

खुद से भी प्यार कर ,मेरी जान,

जीने का सलीका आ जायेगा।

बेकरार सा द़िल तेरा है,

कुछ और न हो पर इसे क़रार आ जायेगा।

ये किस डगर पे चल पड़ी,

तन्हा तन्हा,ए हम़नशीं!!दौर-ए-तूफ़ानों से ना खेल,

ना जाने कहाँ कूचा-ए-दय़ार आ जायेगा।

इस जहाँ में सब मुब्तिला हैं,

रुक कि यहीं ब़ाग-ए-ब़हार आ जायेगा।

कोई रुस्वाई नहीं कहीं,फ़कत प्यार है,

वो प्यार का क़ाफिला यहीं आ जायेगा।

बस एक बार आईना देख और ज़ुल्फें सँवार,

ता-उम्र ज़िन्दगी में सावन का निखार आ जायेगा।

Writen by aruna sharma.

26.01.2019. 1.40pm

All copy rights are reserved by aruna sharma.

Images are taken from Google.

What is love and whom to love?

When I saw myself in the mirror,

I felt love for myself.

Did you see yourselves in your mirror,

There is not only you but the whole world inside your own behalf.

My dear!! If you will not love yourselves,

Then everything will seem to you, ugly n ridiculous.

They are unknown whenever whomever is loved by you,

Here, it is not meant of difference between known and unknown as flew.

Because life is short for living with love and it’s imagination,

Then where is the place of the ridiculous on this station.

Oh dear,walk with me and I will show you the barren site,

There, if you may want but not plant the flowers and only to slit.

Please recognise the reality that hatred has no place in this world,

It is only a wanderer world to disappear into curd.

More butter you will get and forget the word of ridiculous.

See after then so much smoothness on your face glowing like a saint’s calmness.

Please, love yourself after then all lovely things will appear in your life automatically.

You have many treasures inside your heart,get them if all doors are opened magically.

Written by Aruna Sharma.

12.58 at midnight 26.01.2019

All copyrights are reserved by aruna sharma.

All images are taken from Google.

मुहब़्बत-औ-नफ़रत

आज मैंने बड़े गौर से निहारा है आईना;

बहुत प्यार अपने पे आया है समझ के म़ायना।

ये ना समझना कि म़गरूर हो गया है द़िल मेरा,

अरे यार, पहली बार समझ में आया इश़्क तेरा।

हाँ, खोल दिये मैंने सब दरवाजे द़िल के,

घुटन बहुत थी नाश़ाद-ए-द़िल के बन्द क़मरे में।

आज एक नया अहसास हुआ जिन्दगी में,

खुद को खो रहे थे किसी को पाने में।

ग़र मुहब्बत तुम्हें तुमसे ही होगी नहीं,

कौन सी मुहब्बत खिलेगी द़िल के आशिय़ाने में।

नफ़रत की झाड़ियाँ फ़कत खिलती हैं वीराने में,

वहाँ नहीं किसी में कूव्व़त द़िल का फूल खिलाने में।

आ गले लगा ले हर अपने ब़ेगाने को,

क्योंकि हर अपना श़ामिल रहा है पहले ब़ेगाने में।

नफ़रतों का कोई देश भी है क्या,

बता जरा,ए शख्स!!क्या हर्ज है बताने में।

ये तो इक पल का परदेशी है सारे ज़माने में।

छोटी सी जिन्दगी में क्या देखें किसी को आजमाने में,

चल मेरे संग सब आईना बन प्यार का जमाने में,

और देख खेल नया कि क्या है मज़ा द़िल लगाने में।

Written by Aruna Sharma.

26.01.2019. .11.50pm

All copyrights are reserved by Aruna Sharma.

Images are taken from Google.