थोड़ी सी श़रारत कर लूँ ग़र इज़ाजत हो…..

मुझे ,ए स़ाकी!! एक सुराही म़ैय की दे

कि म़दहोशी मे कोई श़रारत को जी चाहता है।

थोड़ी सी नाज़ुक हाथों से ही पिला दे तू

कि तुझे छूने का एक ब़हाना द़िल चाहता है।

इतनी तो आज इऩायत फ़रमाना कि

बरसों बाद फिर बहक जाने को जी चाहता है।

इक म़य का द़रिया ही बना दे मेरी ख़ातिर कि

मेरा द़रवेश सा द़िल हर त़ाल्लुक़ात से दूर उस द़रिया में बहने को जी चाहता है।

सुन ए हसीं-ओ-सुर्ख़ी सी परी सी स़ाकी कि तेरी कुछ रंगीन लब़ो की लाली चुरा सकूँ कि ऐसा

पेंच-ओ-ख़म-ए-अद़ा दिखा,तुझे छेड़ने को जी चाहता है।

चाहे मेरी इस हिम्मत-ए-ज़िल्लत पे धक्का दे दे

और द़रिया में गिरा दे कि डूब कर बहने को जी चाहता है।

एहस़ान होगा तेरा मुझ पर,खफ़ा ना हो,मेरी तौब़ा,

इक बूँद बन कर द़रिया से समन्दर का सफ़र करने को जी चाहता है।

और बूँद सा बन ख़ुदा के वास्ते उस रास्ते पे चल

अपनी बूँद में सारा समन्दर-ए-खुदाई बन इस जहाँ से रिहाई चाहता है।

म़ाशाअल्लाह क्या ख़ूबसूरत सी शऱारत की तुझसे, ऐ स़ाकी!! बस एक बार

एहस़ान करने की इज़ाजत मेरा द़िल माँगता है।

तेरी इक अद़ा पे सौ ज़ान ऩिसार हैं पर मेरा द़िल बेचारा तेरी इक अद़ा से अपने म़हबूब का जहाँ-ए-ख़ुदा मांगता है।

बाकी मेरी दुआऐं तेरे साथ रहेंगी,मेरी मेहरबाँ!! मेरा दिल फ़कत इस जहाँ से ज़ुदा अपना प़ैरोक़ार अपना ख़ुदा माँगता है।

Written by Aruna Sharma.28.11.2021;11.30pm