ये मकान..

तूही बता दे मेरे साथी कि ये घर है कि मकान,

बिकते हैं हर जज़्बात क्या वो है दुकान।

दिन भर के थके हारे लौटते हैं जहाँ,डरे डरे से सो जाते हैं ,

सराय है ये ,क्यों ना बना दें उनके लिये एक मचान।

यहाँ हर करीबी करता है जज़्बातों की द़ावत,अश़्क बनते हैं म़य के ज़ाम।

उफ्फ,मेरे प्यारे साथी!! ले चल मुझे इस समन्दर के पार।

मर ही जायेंगे यहाँ मेरे प्यार के त़सव़्वुर,मेरे यार।

सुन मेरे द़िलदार!!देख वो समन्दर के पार,

जहाँ आसमान मिल रहा है गले समन्दर से हो ब़ेकरार,

इस जहाँ से दूर बना ले आशियाँ बादलों से उस पार।

वो देख मँजर समन्दर पर,कि एक बड़े से आफ़ताब को दे रहा है रहने का द़यार,

हमारी तो बहुत छोटी हस्ती कि हमारे वास्ते भी यकिऩन होगा हस्ब़े व़िसाले बह़ार।

ये ईंट पत्थरों के मकानों में रहते हैं पत्थरों की मूरत-ए-यार,

इनमें है फ़कत इक रौब़ मालिकाना,बस नहीं बसता प्यार।

इक शै’ है ज़लजले की कि आया ,तो होगा उनका जीना दुश़्वार।

ख़ैर कर भी दें उनका शुक्रिया फिर छोड़ सारी मोह माया कि यहाँ नहीं मिलेगा बेच़ैन द़िल को क़रार।

सारी उलझनें प्यार की वहीं जाके सुलझ जायेंगी करिश्माई हाथों से ज्यों म़ू-ए-यार।

अपना तो जो है बस ख़ुदा का दिया खुली ज़मी-औ-आसमान का द़यार।

आ चल ,चलें हम उस जहाँ में जहाँ रहते है चाँद तारे ब़ेशुमार।

Written by Aruna Sharma.22.06.2021;10.40PM

म़ू-ए-यार=प्रियत्तमा के सिर के बाल।

Mu-e-yaar==hair of beloved.

4 thoughts on “ये मकान..

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