रेशम की डोरी से बँधी मेरी उम्मीदों की पतंग…..

रेशम कीऔर डोरी से बँधी है मेरी उम्मीदों की पतंग,

आसमान की ऊँचाई को छूने की लिये उमंग,

हर ब़रस जोड़ देती हूँ और धागे लिये कई रंग,

तमन्ना में कि मिले तेरी दरियाद़िली-ओ-रहमतों का पासंग।

ऐ ख़ुदा!!मेरी क़ोशिशों पे मत होना तंग,

आख़िर को तो तेरा बन्दा हूँ लिये द़िल में लौ दिये की,

ज़िलाऐ रक्खा है इक इब़ादत की तरह

आख़िर द़िल ही तो है, नहीं किसी ताज़ का संग।

अपनी पतंग को और भी ऊँचाईयाँ दे रही हूँ,

बाँध के नई डोरी कि मेरी पतंग की डोरी में कई गाँठें पड़ गई हैं,

वो पतंग ग़र तेरे नज़दीक पहुँचे तो खोल कर देखना हर गाँठ को,

किसी की ख़ुशी की दुआ की ख़ातिर इब़ारत छपी है तेरी रहम़त-ए-ग़ौर को,

या रब़ कुबूल फ़रमा मेरी द़ुआ कि तेरा ही बन्दा है वो आख़िर को,

मेरे अश़्क सूख गये बहते बहते सैलाब़ की तरह,

द़िल के आँसू बहते हैं ,डर है ना बन जाये तेज़ाब की तरह।

मेरे म़ासूम जज़्बातों से वाबस्ता ज़िन्दगी को फिर पहली सी ब़हार दे दे,

मेरी इब़ादतों का कुछ तो दे दे स़िला,

मेरी वो सभी द़ुआ-ए-डोरी में बँधी उम्मीदों में भर दे रंग,

चाहे ले ले मेरी जिस्म-औ-जाँ कि नहीं होगा फ़िर तुझसे कोई ग़िला।

Written by Aruna Sharma.

16.08.2019. 11.50pm

(All copy rights are resrved by Aruna Sharma)

Images are taken from Google.

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4 thoughts on “रेशम की डोरी से बँधी मेरी उम्मीदों की पतंग…..

  1. बेहतरीन रचना। बहुत खूबसूरत दिल से निकली दिल को छूती हुई।👌👌

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