वो अकेला सा द़रख्त…..

वो एक द़रख्त है झुका-झुका सा वीराने में;

इस स़हरा में भटके कोई आजाये इस शामिय़ाने में।

तन्हा सा इसका वुज़ूद माशा अल्लाह बेहद खूबसूरत लगता है;

भटके हुऐ लोगों का ये रब़ का जन्नत लगता है।

मैं देखती हूँ जब भी कहीं कोई तन्हा सा मंजर;

तन्हाई नहीं, हाँ,वो ख़ुदा का जंतर मंतर लगता है।

महफ़िल में बैठे हँसते खिलखिलाते शख्स,क्या उन्हें मालूम नहीं;

तमाशा ये फ़कत जीने का बहाना-ओ-नज़र चुराना है।

अन्जान खुद से हैं या रव़ायतों का महज बहाना है;

दुनिया की हक़ीकत से अन्जान बने ,इतने भी म़ासूम नहीं।

परवाह नहीं कि म़जे लेते हैं मेरी म़ासूमियत का छल-छल कर लोग;

मैं ब़ेपर्दा हूँ ब़ेशर्म नहीं-वो तो हैं ब़ापर्दा-ओ-ब़ेशर्मी के तालाब़ में डूबे लोग।

म़गरूर नहीं अपनी श़ख्सियत पे मैं-पर इत्मीनान है द़िल में;

रहता सुकून बन मेहमाँ द़िल-ए-फ़कीर में,और दौलत रही बेचैनी के महल में।

हाँ,मैं वही तन्हा सा दरख़्त हूँ,साया देने की तलबगार हूँ मैं;

जो आयेगा,ठीक,मेहमाँ होके रहे-नहीं आये तो क्या,इतनी नहीं ब़दकार हूँ मैं।

कलम-ए-नज़्म—-अरूणा शर्मा

तारीख-27.09.2018. .वक्त-9.05 सुबह

तस्वीर हमने एक काॅपी की जिल्द से उतारी है।

5 thoughts on “वो अकेला सा द़रख्त…..

  1. वो एक द़रख्त है झुका-झुका सा वीराने में;

    इस स़हरा में भटके कोई आजाये इस शामिय़ाने में।

    waah kyaa khub likha hai….behtarin lekhan.

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